Saturday, 9 July 2016

दरिया-ए-मुहब्बत मे सैलाब बहुत था….

ताबीर जो मिल जाती तो एक ख्वाब बहुत था
जो शख्स गँवा बैठे है नायाब बहुत था
मै कैसे बचा लेता भला कश्ती-ए-दिल को
दरिया-ए-मुहब्बत मे सैलाब बहुत था….

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